दुनिया भर में मनाया जा रहा मौला-ए-कायनात की आमद का जश्न
NewsBee : पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के भाई व वसी इमाम अली अलैहिस्सलाम की वेलादत बसआदत का जश्न (Ead E Milad Hazrat Ali) दुनिया भर में मनाया जा रहा है। इसे लेकर भारत के विभिन्न शहरों के अलावा, ईरान, सऊदी अरब, लेबनान, यमन इराक, अज़रबैजान आदि मुल्कों में महफ़िल-ए-मिलाद का आयोजन चल रहा है। लोगों ने नए लिबास पहने हैं और माहौल खुशबू से मुअत्तर है।

Ranchi Ead Milad E Ali
भारत में शनिवार को 13 रजब है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम 13 रजब को ही काबे में पैदा (Ead E Milad Hazrat Ali) हुए थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के मिलाद का जश्न दिल्ली, लखनऊ, हैदराबाद, मुंबई, कोलकाता, रांची, जमशेदपुर, धनबाद, जपला हुसैनाबाद, पटना, मुजफ्फरनगर, बीजापुर, इलाहाबाद, बनारस आदि शहरों में हुआ। इस मौके पर कसीदा खानी का आयोजन किया गया। शनिवार को दिन में भी कसीदा खानी का आयोजन होगा।
जमशेदपुर में कसीदे का हुआ आयोजन
जमशेदपुर में इमाम बारगाह हज़रत अबू तालिब अलैहिस्सलाम में कसीदा खानी का आयोजन किया गया। इस मौके पर मौलाना जकी हैदर, करीम सिटी कॉलेज के प्रोफेसर आले अली, शाकिर, अफसर हुसैन, इनाम अली आदि ने कसीदे पढ़े। जाफरी जामा मस्जिद उम्मे खलील के पेश इमाम मौलाना जकी हैदर ने पढ़ा – रंजो अलम मिटाते हैं मौला-ए-कायनात, मुश्किल में काम आते हैं मौलाए-कायनात। दुश्मन सहमने लगते हैं मैदान-ए-जंग में, तलवार जब उठाते हैं मौला-ए-कायनात। प्रोफेसर आले अली ने पढ़ा – जिसकी जुबां को जिक्र ए अली नागवार है, ता हश्र उन पर लानत -ए-परवरदिगार है।

Jamshedpur Ead e Milad Hazrat Ali alaihissalam
छपरा से आए मुराद ने भी मौला-ए-कायनात की शान में एक कसीदा पढ़ा। उन्होंने पढ़ा- मनाओ जश्न कि काबे में आ रहे हैं अली। इनाम अली ने पढ़ा – मिलेगा हमको वो पावर अली अली कह के, करेंगे पार समंदर अली अली कह के।
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कौन थे हज़रत अली अलैहिस्सलाम
हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस्लाम के इतिहास की उन महान और अज़ीम शख़्सियतों में शुमार हैं, जिनका नाम इल्म, शुजाअत (बहादुरी), इंसाफ़ और तक़वा के साथ लिया जाता है। वे न केवल रसूल-ए-अकरम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के अत्यंत क़रीबी थे, बल्कि इस्लाम की बुनियाद रखने वालों में भी सबसे आगे रहे। उनकी ज़िंदगी हर दौर के इंसानों के लिए हिदायत और रहनुमाई का सबक़ हैं। हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के लिए हदीस बयान की है। पैगंबर ए अकरम ने फरमाया – मैं इल्म का शहर हूं, अली उसके दरवाज़ा। ऐ अली तुमसे बोग्ज रखने वाला मुनाफिक है।
प्रारंभिक जीवन
हज़रत अली अलैहिस्सलाम का जन्म लगभग 600 ईस्वी, 13 रजब को मक्का में हुआ। इस्लामी रवायतों के मुताबिक़, उन्हें यह अनोखा सौभाग्य प्राप्त है कि उनका जन्म ख़ाना-ए-काबा के अंदर हुआ। वे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के चचेरे भाई थे और बचपन से ही पैग़म्बर-ए-इस्लाम की निगरानी में पले-बढ़े। इसी वजह से उनका किरदार, सोच और अमल पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की तालीमात से गहराई से प्रभावित रहा।
इस्लाम की ख़िदमत
इस्लाम के शुरुआती और सबसे कठिन दौर में हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम का हर क़दम पर साथ दिया। हिजरत की रात जब दुश्मनों ने पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की शहादत की साज़िश रची, तब हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने निडर होकर उनके बिस्तर पर सोकर अपनी जान की परवाह किए बिना रिसालत की हिफ़ाज़त की। इसी मौके पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने “मर्ज़ी-ए-माबूद” खरीद ली।
वैवाहिक जीवन
हज़रत अली अलैहिस्सलाम का निकाह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की बेटी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा से हुआ। इस पाक रिश्ते से हज़रत हसन और हज़रत हुसैन जैसे अज़ीम फ़र्ज़ंद पैदा हुए, जिन्हें इस्लाम में विशेष मुक़ाम हासिल है।
वीरता और नेतृत्व
हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी बेमिसाल बहादुरी के लिए मशहूर थे। बद्र, उहुद, ख़ंदक और ख़ैबर जैसी जंगों में उनकी तलवार ज़ुल्फ़िकार इस्लाम की हिफ़ाज़त का प्रतीक बनी। ख़ैबर में मरहब का क़त्ल और ख़ंदक में अम्र बिन अब्द-वुद को वासिल-ए-जहन्नुम करना उनकी शुजाअत की ऐतिहासिक मिसालें हैं। इसी कारण उन्हें “असदुल्लाह” यानी अल्लाह का शेर कहा जाता है।
इल्म और इंसाफ़
हज़रत अली अलैहिस्सलाम इल्म और हिकमत का समुंदर थे। उन्हें “बोलता हुआ क़ुरआन” भी कहा जाता है। उनके ख़ुत्बे, ख़तूत और अक़वाल “नहजुल बलाग़ा” में संकलित हैं, जो आज भी इंसाफ़, अख़लाक़ और इंसानियत का महान ग्रंथ माना जाता है। ख़लीफ़ा बनने के बाद उन्होंने बराबरी, इंसाफ़ और नैतिक मूल्यों पर आधारित हुकूमत क़ायम करने की कोशिश की।
शहादत
21 रमज़ान 40 हिजरी (661 ईस्वी) को मस्जिद-ए-कूफ़ा में नमाज़ के दौरान उन पर जानलेवा हमला किया गया। कुछ दिनों बाद वे ज़ख़्मों की ताब न ला सके और शहीद हो गए। उनकी शहादत इस्लाम के इतिहास की सबसे दर्दनाक और ग़मगीन घटनाओं में से एक मानी जाती है।
आज भी आदर्श
हज़रत अली अलैहिस्सलाम आज भी पूरी मुस्लिम दुनिया में इंसाफ़पसंद हाकिम, ग़रीबों और मज़लूमों के हामी, सादगी, ईमानदारी और साहस के प्रतीक के रूप में याद किए जाते हैं। उनका जीवन इंसानियत, सब्र और हक़ की राह पर चलने की ज़िंदा मिसाल है।
परिचय
पूरा नाम: हज़रत अली इब्न अबी तालिब
जन्म: 13 रजब, लगभग 600 ईस्वी, मक्का
शहादत: 21 रमज़ान, 661 ईस्वी, कूफ़ा (इराक)
प्रमुख पहचान
* रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के चचेरे भाई और दामाद
* दामाद-ए-रसूल (हज़रत फ़ातिमा ज़हरा से विवाह)
* वसी-ए-रसूल
* बहादुरी, इल्म और इंसाफ़ की अज़ीम मिसाल
हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस्लाम के इतिहास की उन अज़ीम हस्तियों में से हैं, जिनकी ज़िंदगी हर ज़माने के इंसानों के लिए रहनुमाई का चिराग़ है।




