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19 साल बाद अजय बर्मन हत्याकांड में बड़ा मोड़, ज्वेलर्स मालिक समेत कई लोगों पर हत्या का मुकदमा चलेगा

Jamshedpur (Jharkhand ) : करीब 19 वर्ष पुराने चर्चित अजय बर्मन हत्याकांड में अदालत ने महत्वपूर्ण आदेश देते हुए ज्वेलर्स व्यवसायी मिलन आडेसरा, उसके भतीजे संदीप आडेसरा, दुकान के कर्मचारियों और अन्य आरोपितों के खिलाफ हत्या के मामले में मुकदमा चलाने का रास्ता साफ कर दिया (Jamshedpur AjayBarman Murder) है। न्यायिक दंडाधिकारी अरविंद कुमार की अदालत ने आरोपितों के खिलाफ संज्ञान लेते हुए उन्हें अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया (Jamshedpur AjayBarman Murder) था।

मामला वर्ष 2007 का है। 24 वर्षीय अजय बर्मन पेशे से सोनार था और वर्षों तक कारीगरी सीखने के बाद स्वयं गहने बनाने का काम करता था। आरोप है कि 11 मई 2007 को वह गोलमुरी स्थित टीएम ज्वेलर्स की शाखा में अपना बकाया भुगतान लेने गया था। परिजनों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, काफी देर तक इंतजार कराने के बाद दुकान के मालिक, कर्मचारियों और अन्य लोगों ने उसके साथ मारपीट की। आरोप है कि मारपीट के दौरान उसे गंभीर चोटें लगीं और बाद में उसकी मौत हो गई।

घटना के बाद तत्कालीन पुलिस कार्रवाई भी सवालों के घेरे में रही। मामले में दर्ज एफआईआर को लेकर परिवार की ओर से कई गंभीर आरोप लगाए गए। परिजनों का कहना था कि वास्तविक शिकायत को दबा दिया गया और मामले को दूसरी दिशा देने की कोशिश की गई।

परिवार की गुहार पर लोक स्वातंत्र्य संगठन (पीयूसीएल) ने स्वतंत्र जांच की थी। संगठन की रिपोर्ट में दावा किया गया कि अजय बर्मन बकाया राशि लेने दुकान गया था और उसके साथ दुकान के अंदर मारपीट की गई थी। रिपोर्ट में भीड़ द्वारा हत्या किए जाने के दावे को भी खारिज किया गया था। बाद में यह मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा।

जांच के दौरान सामने आए तथ्यों में यह भी कहा गया कि सीसीटीवी फुटेज में हथियार या बम जैसी कोई वस्तु दिखाई नहीं दी थी। साथ ही मारपीट से पहले सीसीटीवी बंद किए जाने की बात भी सामने आई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट को भी तत्कालीन पुलिस और आरोपितों के दावों के विपरीत बताया गया।

मामले में यह आरोप भी लगाया गया कि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों में गड़बड़ी हुई। इसके बाद पीयूसीएल और मृतक के परिजनों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट ने पूर्व में दाखिल अंतिम रिपोर्ट को अवैध ठहराते हुए शिकायत याचिका दायर करने का रास्ता खोला था।

लंबी कानूनी लड़ाई, विभिन्न न्यायालयों में सुनवाई और पुनर्विचार याचिकाओं के बाद अंततः अदालत ने मामले में हत्या के आरोपों को गंभीर मानते हुए आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया है। इससे मृतक परिवार को लगभग दो दशक बाद न्याय मिलने की उम्मीद जगी है।

इस मामले में मृतक पक्ष की ओर से अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव, अमिताभ कुमार, मंजरी सिन्हा और निर्मल घोष ने पैरवी की। अधिवक्ताओं ने अदालत के आदेश का स्वागत करते हुए इसे न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

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