Jamshedpur (Jharkhand): वर्ष 2017 में मानगो क्षेत्र में हुए दंगे (Mango Riot) से जुड़े बहुचर्चित मामले में मंगलवार को बड़ा फैसला आया। एडीजे थ्री आनंद मणि त्रिपाठी की अदालत ने कांग्रेस नेता फिरोज खान, नूरुल हक उर्फ झुन्ना, आफताब सिद्दीकी, शहनवाज़ अहमद, तारिक खान, वसीम बच्चा, नसीम अख्तर, बीनू, अनवर मिट्ठू और मंजूर कांच वाले को बरी कर दिया। पुलिस इन पर आरोपों को साबित नहीं कर सकी। इस दंगे में तीन केस दर्ज किए गए थे। इस मामले में 16 अक्टूबर को भी एक फैसला आने वाला है। पीड़ितों का केस अधिवक्ता मोहम्मद जाहिद इकबाल ने लड़ा।
साल 2017 में हुआ था दंगा
18 मई 2017 को सरायकेला में हुई मॉब लिंचिंग की घटना ने पूरे इलाके को हिला दिया था। इसके विरोध में मुस्लिम एकता मंच ने मानगो में प्रदर्शन बुलाया। पुलिस का आरोप है कि थाने में तोड़फोड़ हुई, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा और करीब चार लाख रुपये की क्षति का आरोप लगा। इस घटना (Mango Riot) में उलीडीह ओपी प्रभारी मुकेश कुमार और आजाद नगर थाना प्रभारी जितेंद्र ठाकुर के घायल होने की बात भी एफआईआर में दर्ज की गई। आरोपियों का कहना है पुलिस ने मामले को उलझाने के लिए ये आरोप लगाते हुए गलत प्राथमिकी दर्ज की थी। सभी को न्यायालय पर भरोसा था।
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एफआईआर और मुकदमा
घटना के तुरंत बाद पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की। मानगो थाना में दर्ज एफआईआर में कांग्रेस नेता फिरोज खान, नूरुल हक झुन्ना समेत 87 लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया। आरोप था कि ये सभी दंगे की साजिश और हिंसक भीड़ का हिस्सा थे। जबकि , आरोपियों का कहना है कि उन्हें झूठा फंसाया गया है। वर्षों तक केस चलता रहा और यह मामला शहर की सियासत और अपराध-जुर्म के बीच चर्चा में बना रहा।
अदालती कार्यवाही
इस केस की सुनवाई एडीजे थ्री आनंद मणि त्रिपाठी की अदालत में हुई। अभियोजन पक्ष ने आठ पुलिस अधिकारियों की गवाही कराई। गवाहों ने दंगे, तोड़फोड़ और पुलिस अधिकारियों पर हमले की घटनाओं का हवाला दिया। वहीं बचाव पक्ष की तरफ से अधिवक्ता मोहम्मद जाहिद इकबाल ने पैरवी की। उनका कहना था कि आरोपितों को झूठा फंसाया गया है, उनके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं है और पुलिस ने भीड़ की पहचान स्पष्ट तरीके से नहीं की।
फैसला और निहितार्थ
काफी लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने 10 आरोपियों को बरी कर दिया है। फैसले में यह माना गया कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में विफल रहा। पुलिस अपने आरोपों के पक्ष में कोई सुबूत नहीं दे सकी।

