कैग ने भी सबलीज आवंटन पर उठाए थे सवाल सरकार की जमीन की हो गई बंदरबांट
Jamshedpur (Jharkhand) : जमशेदपुर में बिष्टुपुर स्थित पीएम मॉल पर टाटा स्टील की कार्रवाई के बाद 59 सबलीज का विवाद फिर गरमा गया है। जमशेदपुर में टाटा स्टील ने 59 सबलीज (Jamshedpur Tata Sublease Scam) बांटी थी, जिस पर विवाद के बाद मामले की जांच कराई गई थी। जांच में सामने आया था कि टाटा स्टील ने राजस्व विभाग के नियम कानून को ताक पर रख कर 59 लोगों को जमीन सब लीज कर दी थी। सरकार ने साल 2017 में तत्कालीन कोल्हान कमिश्नर अरुण की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित कर पूरे मामले की जांच कराई, जिसमें पाया गया की 59 सब लीज (Jamshedpur Tata Sublease Scam) गैरकानूनी है।
4288 पन्नों की पांच वॉल्यूम वाली जांच रिपोर्ट सरकार को भेज दी गई थी, जिस पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। जब भी अधिकारियों से पूछा गया, तो उन्होंने यही बताया कि इस जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई के लिए अटॉर्नी जनरल से मंतव्य मांगा गया है। 9 साल हो गए अभी तक सरकार को शायद यह मंतव्य नहीं मिला। इसीलिए कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाई।
पूर्व कमिश्नर अरुण की अध्यक्षता वाली कमेटी में पूर्वी सिंहभूम के तत्कालीन डीसी अमिताभ कौशल भी थे। पूर्व कमिश्नर और तत्कालीन डीसी ने मिलकर सभी 59 सब लीज की जांच की थी। वह मौके पर गए थे। बाद में रिपोर्ट तैयार की गई।
पहले ही वॉल्यूम में है घोटाले की बात
सूत्रों की मानें तो पहले ही वॉल्यूम में यह बात बताई गई कि सबलीज के आवंटन में पूरी तरह नियमों को ताक पर रख दिया गया। तब इसे कोयला घोटाले से भी बड़ा फर्जीवाड़ा माना गया था। जांच में सामने आया था कि सबलीज के आवंटन के समय जो भी प्रशासनिक और कंपनी के अधिकारी थे उन्होंने पिक एंड चूज का फार्मूला अपनाया था। लोगों की शक्ल और हैसियत देखकर उनको जमीन आवंटित की गई थी।
सब लीज की जमीन की पैरामाउंट ओनर सरकार ही है
टाटा सब लीज को लेकर हाईकोर्ट में (डब्ल्यूपीसी नंबर 6138 /2012) में चल रहे मुकदमे में टाटा स्टील ने एफिडेविट दायर किया था और कहा था की जमीन का पैरामाउंट ओनर सरकार नहीं है। इसी बात पर तत्कालीन कोल्हान कमिश्नर अरुण ने मामले की अधिकारियों के साथ जांच की। सब लीज समझौता खंगाला तो पता चला की जमीन की पैरामाउंट ओनर सरकार ही है।
20 अगस्त साल 2005 को सरकार और टाटा स्टील के बीच हुए समझौते की कंडिका 19 में लिखा था कि जमीन का पैरामाउंट ओनर यानी मालिक सरकार होगी। इसके बाद जिला प्रशासन ने टाटा स्टील के एमडी टीवी नरेंद्रन को नोटिस जारी किया था।
4700 करोड़ से अधिक का है टाटा सब लीज घोटाला
बाद में कैग ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि टाटा सबलीज के जरिए 59 कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया। राज्य सरकार को 4700 करोड़ रुपए के राजस्व की चपत लगी। टाटा स्टील ने अपने लीज एरिया में एक सीमेंट प्लांट स्थापित किया था। यह सीमेंट प्लांट 122.82 एकड़ भूमि में था।
पहले लाफार्ज फिर निरमा को बेची गई सीमेंट प्लांट की जमीन
बाद में इसका पट्टा लाफार्ज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को स्थानांतरित कर दिया गया। इसके बाद साल 2015 में तत्कालीन डीसी ने लाफार्ज इंडिया को पत्र लिखा कि टाटा स्टील को पट्टा समझौते के प्रावधान के तहत भूमि स्थानांतरण का अधिकार नहीं है। बाद में लाफार्ज इंडिया ने निरमा को यह प्लांट बेच दिया। सवाल यह उठता है कि जब सीमेंट प्लांट की जमीन सरकार की है तो इसे टाटा स्टील या लाफार्ज कैसे बेच सकती है।
दबा दिया गया पूरा मामला
टाटा सब लीज घोटाले में कई सवाल अभी भी तैर रहे हैं। जमशेदपुर अधिसूचित क्षेत्र समिति ने किस हैसियत से सभी 59 प्लाटों पर निर्माण कार्य के लिए नक्शे को मंजूरी दी। जबकि जमीन का मालिकाना हक का कोई दस्तावेज उनके पास मौजूद नहीं है। यही नहीं बड़े-बड़े बैंकों ने भी सब लीज धारकों को बिना दस्तावेज देखे ही लोन भी दे दिया। इस मामले में हाई कोर्ट में केस चल रहा था। हाई कोर्ट के आदेश पर ही तत्कालीन कोल्हान कमिश्नर अरुण की अध्यक्षता में कमेटी बनाकर सरकार ने मामले की जांच कराई थी और जांच रिपोर्ट कोर्ट को भी सौंपी जानी थी। कोर्ट में यह कार्रवाई कब स्थगित हो गई और कहां तक मामला पहुंचा। इसकी भी जानकारी अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई है। यानी पूरा का पूरा मामला दबा दिया गया।
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